सरकारी कड़ी कानूनी रोकड़ के बावजूद भारत में अवैध ऑनलाइन सट्टेबाज़ी का उद्भ्रम इतना बड़ा हो गया है कि इसका बाज़ार ₹10 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच चुका है। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में भ्रष्टाचार और कानून के प्रतिकूल चलने वाले इस व्यापार की रफ़्तार सरकार की सभी रोकथाम कोमियों को चुनौती दे रही है।
रिपोर्ट के अनुसार केवल 15 अवैध ऑनलाइन सट्टा प्लेटफॉर्म पर 540 करोड़ से ज़्यादा VISIT दर्ज किए गए, जिसका अर्थ है कि हर रोज़ औसतन लगभग 1.48 करोड़ लोग इन वेबसाइटों तक पहुँच बना रहे हैं। यह आँकड़ा बताता है कि सट्टेबाज़ी भारतीय समाज के किस हद तक फैल चुकी है।
कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए इन प्लेटफॉर्मों के संचालक अपनी सर्वर सुविधाएँ विदेश में स्थापित कर चुके हैं। भारतीय क़ानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए इनके पीछे जाना अब काफी कठिन हो गया है। साथ ही, ये अपने वित्तीय लेनदेन के लिए म्यूल बैंक खातों, टेलीग्राम समूहों और लगातार नए डोमेन नामों का उपयोग करते हुए अपनी पहचान छुपाते हैं।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि 854 से ज़्यादा डिजिटल प्रभावशाली व्यक्ति (इन्फ्लुएंसर) सोशल मीडिया के ज़रिए इन अवैध सट्टा प्लेटफॉर्मों को बढ़ावा दे रहे हैं। उनकी ओर से की जा रही प्रचार-प्रसार गतिविधि ने विशेषकर युवाओं को इसकी ओर आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
भारतीय क़ानून अधिकांश ऑनलाइन जुआ की मनाही करता है, लेकिन राज्य-वार लागू होने वाले नियम असंगत हैं। कई सट्टा ऐप्स स्वयं को फैंटेसी गेमिंग या कौशल-आधारित प्लेटफॉर्म बताकर कानूनी क्षेत्रों के धुंधले इलाक़े का फायदा उठा रहे हैं। सरकार के अधिक नियमन की दिशा में किए जा रहे प्रयासों के बावजूद, क़ानूनी फैंटेसी गेमिंग और अवैध सट्टेबाज़ी के बीच अंतर स्पष्ट नहीं हो पा रहा।



